नीयत का खेल है कुछ एस तरह निराला
अकसर चिराग तले ही होता है अंधेरा
नीयत ही आपकी नीयती तय करती है
याद रहे ऊपरवाला नीयत देखता है. नुमाइश नही
नीयत रखो नेक, तो कभी झुकना नहीं पडेगा
ना किसी की नजरो में, या फिर किसी की कदमो में
अपनी पेहेचान दौलत से नहीं, नीयत से ही होती हैं
नीयत अगर हो साफ, तो मिल जायेंगे रास्ते अनेक
© अजित भा. खाडीलकर (९९२२२१६००७)
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