तुम हो इर्द गिर्द
सुनहरी सी,गुनगुनी धूप की चादर ओढ़ेचाय की चुस्कियों संग की सुबहयाद दिलाती हैतुम हो यहीं कहीं इर्द गिर्दधूप- छाँव तले… पलाश केफूलों से भरी डालीगाँव की पगडंडी परसाथ साथ चलतेहाथों से हाथों की वो छुअनतरोताज़ा होकर आज भीज़िंदा है मेरे Read more









