मोबाइल के आने से, कई हो गए हैं पागल
जीने का यही जरिया हो गया है आजकल।
उंगलियाँ ही निभा रही हैं सभी रिश्ते
जुबान को वक्त ही नहीं किसी के वास्ते।
सब टच में बिजी हैं, मगर टच में कोई नहीं
क्या मतलब है इस जीने का, सोचो तो सही।
उठते, बैठते, सोते-जागते, चलते सब मोबाइल पे कर रहे हैं बातें
दूर वाले हो गए हैं पास, और पास वाले दूर इसी के वास्ते।
© अजित भा. खाडीलकर (९९२२२१६००७)
0 Comments